दिल्ली- दिल वालों का शहर; वैसे तो इस शहर से मेरा वास्ता सिर्फ किताबों और लेखों में ही रहा है लेकिन २०१९ में दो मर्तबा मेरी भी मुलाकात हो ही गयी अपरिमित इतिहास के सम्राट माने जाने वाले भारतवर्ष की दुल्हन से। वैसे तो आजकल समय भी समन्दर की गहराई की तरह अथाह है मेरे पास लेकिन अभी भी एक समस्या ये थी कि उस शहर की हवा में साँस लेना मतलब जान से हाँथ धोना है। ख़ैर, बुलावा भारत की राजधानी का था तो मना करने की ताकत मुझमें रही नहीं तो तारीख मुकर्रर की गई और साथ मे रिज़र्व हुई बस की एक स्लीपर सीट क्योंकि पैसा बहुत है अपने पास और बैठ कर जाने का हौसला बिल्कुल नहीं। निश्चित दिनाँक पर रात्रि-भोजन करने के पश्चात घर को अलविदा कह दिया हमने। ठंडी हवा के मस्त मगन झोंको से मुलाक़ात करनी थी तो शहर की आधुनिकता की परिचायक 'कैब' न कर के ऑटो रिक्शा में ही चल दिये। अलीगंज तक तो सब ठीक था, आखिर अपना मोहल्ला था वो। पर जैसे ही IT चौराहा पार किया, ऐसा प्रतीत हुआ मानो अफ्रीका के गाँव से निकल के बीजिंग पहुँच गए- एक तो इतना ट्रैफिक और उसपे गाड़ी के हॉर्न पर अंगूठे को चिपका के रखने वाले लोग, 'मिर्ज़ाप...