नागरिकता बिल (संशोधित) आये हुए आज लगभग १ हफ्ता हो गया है। और इतना ही समय हो गया है यह पढ़ते और सुनते हुए कि पुलिस और विद्यार्थियों में झड़प हो रही है (और यह घटनाक्रम २०१६ से शुरू होता है)। और अभी २०१९ में जब यह बिल लोकसभा में पुनः पेश हुआ है, तभी से ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है क्योंकि कुछ मानसिक अपंग और ओछी मानसिकता वाले व्यक्तियों ने इसका विरोध किया। और उन्हें मानसिक अपंग की संज्ञा इसलिए नही दी मैने क्योंकि मैं कोई भक्त हूँ और न ही इसलिए क्योंकि उन्होंने विरोध किया; बल्कि इसलिए क्योंकि उनके विरोध की नींव ऐसे कारण पर टिकी है जो किसी भी परिदृश्य में सही नही है। अगर इसका विरोध इसलिए किया जाता कि भारतवर्ष की निधियों पर इसका असर पड़ेगा और हो सकता है कि आने वाले समय मे कुछ राज्य अपना इतिहास और अपनी पहचान खो देंगे (जिस कारणवश असम में इसका विरोध हो रहा है) तब वो विरोध शायद उचित होता किन्तु उसमे भी एक शर्त यह है कि वह विरोध पूर्णरूपेण अहिंसक हो। क्योंकि हिंसा का एक नन्हा अंश भी विरोध का स्वरूप बदल देगा और पूरे देश को एक ऐसी आग में झुलसा देगा जिसका लाभ चंद राजनीतिक पार्टियों को...
दिल्ली- दिल वालों का शहर; वैसे तो इस शहर से मेरा वास्ता सिर्फ किताबों और लेखों में ही रहा है लेकिन २०१९ में दो मर्तबा मेरी भी मुलाकात हो ही गयी अपरिमित इतिहास के सम्राट माने जाने वाले भारतवर्ष की दुल्हन से। वैसे तो आजकल समय भी समन्दर की गहराई की तरह अथाह है मेरे पास लेकिन अभी भी एक समस्या ये थी कि उस शहर की हवा में साँस लेना मतलब जान से हाँथ धोना है। ख़ैर, बुलावा भारत की राजधानी का था तो मना करने की ताकत मुझमें रही नहीं तो तारीख मुकर्रर की गई और साथ मे रिज़र्व हुई बस की एक स्लीपर सीट क्योंकि पैसा बहुत है अपने पास और बैठ कर जाने का हौसला बिल्कुल नहीं। निश्चित दिनाँक पर रात्रि-भोजन करने के पश्चात घर को अलविदा कह दिया हमने। ठंडी हवा के मस्त मगन झोंको से मुलाक़ात करनी थी तो शहर की आधुनिकता की परिचायक 'कैब' न कर के ऑटो रिक्शा में ही चल दिये। अलीगंज तक तो सब ठीक था, आखिर अपना मोहल्ला था वो। पर जैसे ही IT चौराहा पार किया, ऐसा प्रतीत हुआ मानो अफ्रीका के गाँव से निकल के बीजिंग पहुँच गए- एक तो इतना ट्रैफिक और उसपे गाड़ी के हॉर्न पर अंगूठे को चिपका के रखने वाले लोग, 'मिर्ज़ाप...