Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2019

मानसून

2 दिन बीत चुके हैं अब तक चाँद मुझसे वो बाज़ी जीत चुका है और शायद उन पेड़ों को भी चार्जर मिल गया होगा; मैं लखनऊ से 'बाबुल की दुवाएँ लेती जा . . .' वाला आशीर्वाद ले कर उसको अलविदा कह चुका हूँ और आज ही ब्रह्म मुहूर्त में गोरखपुर पहुँचा हूँ। 8 बजे सूरज ने यह कह कर उठाया कि भाई कितना सोयेगा तू, गाँधी जी ने भले ही देश को बंटने से न रोका हो पर तेरे सपने पूरे कर के तेरी जिंदगी में सुकूँ वही लाएंगे। पर मैने तो muscle-blaze का प्रचार देखा है और अब मैं ज़िद्दी हूँ। मैने खिड़कियाँ बन्द की और कूलर चला कर चद्दर तान ली। अविनेश भइया भी कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने सोने की इजाजत तो दे दी पर साथ ही खिड़कियाँ खुली रखने का हुक्म भी दिया। वैसे, सूरज से मेरी दोस्ती इतनी पुरानी है कि वो मेरी पसन्द-नापसन्द को अच्छे से जानता है तो इस बार मुझे जगाने वो खुद नहीं आया, बल्कि भेजा ठंडी हवा के झोंके को जिसके प्रति मेरे असीम प्रेम को पूरी दुनिया जानती है और उसके साथ आई नन्ही बारिश की फुहार, शायद वो भी बाहर घुमने को जिद्द कर बैठी होगी और प्यारे दादा की तरह हवा के झोंके ने उसकी इच्छा मान ली होगी। ...

सफर

"इतनी गर्मी में रोडवेज़ बस से मैं नहीं जाऊंगा" -यही ख्याल मेरी खोपड़ी में कुंडली मार के बैठा था। गोरखपुर से लखनऊ तक लगभग तीन -सौ किलोमीटर के इस सफर से लगाव तो वैसे भी नहीं था पर सोंचा की चलो इसी बहाने नवाबों के शहर की उस हवा से फिरसे मुलाक़ात कर लूँगा जो कभी मेरा पहला प्यार हुआ करती थी। इसी के साथ मैने निर्णय लिया कि कल प्रातः शुरू होने वाले इस सफर को आज रात ही किया जाए। इस नेक ख्याल का दिमाग मे आना हुआ कि इक्कीसवीं शताब्दी के इंडिपेंडेंट लौंडे की तरह बैग उठाया और ला के अपनी तशरीफ़ रख दी उत्तर प्रदेश परिवहन की रोडवेज़ बस में। पंद्रह मिनट तक बस में मेरा बैग एक सच्चे साथी की तरह मेरा इंतज़ार कर रहा और मैं लक्ष्मणपुर (लखनऊ) की यादों में खोया वहाँ की पसंदीदा स्नैक्स को गोरखपुर के बसअड्डे पर ट्राय कर रहा था जो कि अजीब-सा ही मेलजोल है बन-मक्खन और चाय का। एक अरसे बाद उसे खा के ऐसा लगा मानो अश्वत्थामा को उसके शाप से मुक्ति मिल गयी हो। ख़ैर, मेरी उम्मीदों पे खरा उतरकर मेरी बस 5 मिनट देर से चली और देखते ही देखते मानव इतिहास में सबसे उत्तम निर्माण पर यह आठ-पहिया बस दौड़ लगाने लगी...