2 दिन बीत चुके हैं अब तक चाँद मुझसे वो बाज़ी जीत चुका है और शायद उन पेड़ों को भी चार्जर मिल गया होगा; मैं लखनऊ से 'बाबुल की दुवाएँ लेती जा . . .' वाला आशीर्वाद ले कर उसको अलविदा कह चुका हूँ और आज ही ब्रह्म मुहूर्त में गोरखपुर पहुँचा हूँ। 8 बजे सूरज ने यह कह कर उठाया कि भाई कितना सोयेगा तू, गाँधी जी ने भले ही देश को बंटने से न रोका हो पर तेरे सपने पूरे कर के तेरी जिंदगी में सुकूँ वही लाएंगे। पर मैने तो muscle-blaze का प्रचार देखा है और अब मैं ज़िद्दी हूँ। मैने खिड़कियाँ बन्द की और कूलर चला कर चद्दर तान ली। अविनेश भइया भी कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने सोने की इजाजत तो दे दी पर साथ ही खिड़कियाँ खुली रखने का हुक्म भी दिया। वैसे, सूरज से मेरी दोस्ती इतनी पुरानी है कि वो मेरी पसन्द-नापसन्द को अच्छे से जानता है तो इस बार मुझे जगाने वो खुद नहीं आया, बल्कि भेजा ठंडी हवा के झोंके को जिसके प्रति मेरे असीम प्रेम को पूरी दुनिया जानती है और उसके साथ आई नन्ही बारिश की फुहार, शायद वो भी बाहर घुमने को जिद्द कर बैठी होगी और प्यारे दादा की तरह हवा के झोंके ने उसकी इच्छा मान ली होगी। ...