नागरिकता बिल (संशोधित) आये हुए आज लगभग १ हफ्ता हो गया है। और इतना ही समय हो गया है यह पढ़ते और सुनते हुए कि पुलिस और विद्यार्थियों में झड़प हो रही है (और यह घटनाक्रम २०१६ से शुरू होता है)। और अभी २०१९ में जब यह बिल लोकसभा में पुनः पेश हुआ है, तभी से ऐसी घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है क्योंकि कुछ मानसिक अपंग और ओछी मानसिकता वाले व्यक्तियों ने इसका विरोध किया। और उन्हें मानसिक अपंग की संज्ञा इसलिए नही दी मैने क्योंकि मैं कोई भक्त हूँ और न ही इसलिए क्योंकि उन्होंने विरोध किया; बल्कि इसलिए क्योंकि उनके विरोध की नींव ऐसे कारण पर टिकी है जो किसी भी परिदृश्य में सही नही है।
अगर इसका विरोध इसलिए किया जाता कि भारतवर्ष की निधियों पर इसका असर पड़ेगा और हो सकता है कि आने वाले समय मे कुछ राज्य अपना इतिहास और अपनी पहचान खो देंगे (जिस कारणवश असम में इसका विरोध हो रहा है) तब वो विरोध शायद उचित होता किन्तु उसमे भी एक शर्त यह है कि वह विरोध पूर्णरूपेण अहिंसक हो। क्योंकि हिंसा का एक नन्हा अंश भी विरोध का स्वरूप बदल देगा और पूरे देश को एक ऐसी आग में झुलसा देगा जिसका लाभ चंद राजनीतिक पार्टियों को ही मिलेगा न कि आम जन मानस को।
किन्तु इसका विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि NRC (Assam Accord) के द्वारा निष्काषित १९ लाख लोगों (जिनमें लगभग १६ लाख हिन्दू और ३ लाख मुसलमान हैं) में से लगभग ५ लाख हिन्दुओं को CAA के तहत भारत की नागरिकता मिल जाएगी और बाकी ३लाख मुसलमानो को नही, इसलिए यह विरोध बिल्कुल ही निराधार और गलत है। क्योंकि तब वो प्रदर्शनकारी जो सरकार पर धर्म-निरपेक्ष न होने का आरोप लगा रहे हैं, स्वयं भी इसे धर्म के चश्मे से ही देख रहे हैं. . .
. . .और अजीब बात तो ये है कि एक समूह विशेष की नाराजगी इस बात पर नही है कि भारत में उन ५ लाख (यह संख्या सिर्फ असम की है, जो कि आने वाले वक्त में बहुत तेजी से बढ़ेगी और इसका कुप्रभाव भी भारतीय नागरिक ही झेलेंगे) बाहरी लोगों को भारतीय नागरिकता क्यों दी जा रही है बल्कि इस बात से है कि ३ लाख मुसलमानों को क्यों नही दी जा रही। अगर इसे संप्रदयिक दृष्टि से ही देखना है तो न आप सही है, न आपका विरोध और न ही आपका तर्क।
'अनेकता में एकता' का तमगा लगा कर स्वयं ही साम्प्रदायिकता का चोंगा ओढ़ने वालों को कोई हक ही नही है ऐसा प्रदर्शन करने का।
वैसे तो विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के साथ जो भी हो रहा है वो राजनीतिक और राष्ट्रीय, दोनों ही पटलों पर उचित नही है और हिंसा का विचार-मात्र भी विध्वंसक होता है, प्रयोग करना तो निःसंदेह विध्वंसकारी ही होगा। किंतु फिर भी यदि; और मैं इस शब्द को दोहरा देता हूँ कि 'यदि' JMI, AIMS, IITs, आदि जैसे नामचीन विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी विद्यार्थी उसी मानसिकता के साथ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं और आप भी उनके समर्थन में हैं और आपको भी लगता है कि वो जो कुछ भी कर रहे हैं, वह सही है; सिर्फ और सिर्फ तभी दिल्ली पुलिस की कार्यवाही भी सही है, और सही है हर वो तरीका जो देश की विभाजनकारी शक्तियों का दमन करने के लिए उपयोग किया जाएगा।
इस पूरे परिदृश्य को अगर आप केवल एक भारतीय हो कर देखें तो आप जान पाएंगे कि यह जो तांडव हो रहा है देश भर में, वह कुछ और नही बल्कि सिर्फ कुछ राजनीतिक दलों द्वारा अपने लाभ के लिए खेली गई एक बेहद ही गन्दी और खतरनाक चाल है। और इसमें उनका लाभ हो या न हो, परन्तु इसमे आपकी और आपके देश की हानि जरूर है।
अंत मे कुछ प्रश्न पूछना चाहूँगा, किसी के पास यदि उत्तर हो तो अवश्य दे कि अगर उन ३ लाख लोगों को नागरिकता न मिलने के लिए ये प्रदर्शन है, तो उन ११ लाख लोगों के लिए प्रदर्शन क्यों नही? और अगर ५ लाख लोगों को शरण देने की खुशी है तो इतना उग्र प्रदर्शन क्यों? 'पराये लोगों' को 'अपना' बनाने की ऐसी भी क्या चाहत है कि हम अपनी ही संपत्ति का नुकसान कर रहे हैं?
Very true and apt at each and every word...
ReplyDeletethank you for the 'review', kindly share. 🙂
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