2 दिन बीत चुके हैं अब तक चाँद मुझसे वो बाज़ी जीत चुका है और शायद उन पेड़ों को भी चार्जर मिल गया होगा; मैं लखनऊ से 'बाबुल की दुवाएँ लेती जा. . .' वाला आशीर्वाद ले कर उसको अलविदा कह चुका हूँ और आज ही ब्रह्म मुहूर्त में गोरखपुर पहुँचा हूँ।
8 बजे सूरज ने यह कह कर उठाया कि भाई कितना सोयेगा तू, गाँधी जी ने भले ही देश को बंटने से न रोका हो पर तेरे सपने पूरे कर के तेरी जिंदगी में सुकूँ वही लाएंगे। पर मैने तो muscle-blaze का प्रचार देखा है और अब मैं ज़िद्दी हूँ। मैने खिड़कियाँ बन्द की और कूलर चला कर चद्दर तान ली।
अविनेश भइया भी कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने सोने की इजाजत तो दे दी पर साथ ही खिड़कियाँ खुली रखने का हुक्म भी दिया। वैसे, सूरज से मेरी दोस्ती इतनी पुरानी है कि वो मेरी पसन्द-नापसन्द को अच्छे से जानता है तो इस बार मुझे जगाने वो खुद नहीं आया, बल्कि भेजा ठंडी हवा के झोंके को जिसके प्रति मेरे असीम प्रेम को पूरी दुनिया जानती है और उसके साथ आई नन्ही बारिश की फुहार, शायद वो भी बाहर घुमने को जिद्द कर बैठी होगी और प्यारे दादा की तरह हवा के झोंके ने उसकी इच्छा मान ली होगी।
खिड़की से बिन बुलाए मेहमान की तरह दोनो अंदर आये और किसी पुराने करीबी मित्र की तरह मुझे आगोश में ले कर बोले कि अब उठ भी जा यार, कितना सोयेगा!
इनको बुलाने के लिए भी मिन्नतें की थी मैने तो जाने कैसे देता इसलिए बिस्तर छोड़ कर उन्हें दोबारा गले लगाने जा पहुँचा अपनी छत पर।
इनको बुलाने के लिए भी मिन्नतें की थी मैने तो जाने कैसे देता इसलिए बिस्तर छोड़ कर उन्हें दोबारा गले लगाने जा पहुँचा अपनी छत पर।
लेकिन यहाँ मेरा प्यार थोड़ी गुस्सा और थोड़ी खुशी में बदल गया। खुशी इस बात की थी कि चारों ओर पेंड़-पौधे ऐसे लग रहे थे मानो रेगिस्तान में हफ्तों से प्यासे भटकते मुसाफिरों को किसी ने बाल्टी भर के अमृत दिया हो; अगर कोई पहाड़ों को यहाँ ला पाता तो गीता प्रेस की कसम गोरखपुर कसोल से कम नहीं होता। और गुस्सा इसलिए कि मेरी मोहब्बत मुझसे मिलने से पहले पूरे मोहल्ले में घूम आयी।
उनके आने से इतना खुश हूँ मानो एक सच्चे आशिक़ को उसका इश्क़ और एक बूढ़े बाप को उसकी इकलौती संतान का साथ मिल गया हो। और ये कामना कर रहा हूँ कि इस बार गर्मियों की छुट्टियाँ वो दोनो मेरे साथ बिताएंगे. . .

bhht bdhiya... pyaare mitr
ReplyDeleteWah kya baat hai maza aa
ReplyDeletegya