गोरखपुर से लखनऊ तक लगभग तीन-सौ किलोमीटर के इस सफर से लगाव तो वैसे भी नहीं था पर सोंचा की चलो इसी बहाने नवाबों के शहर की उस हवा से फिरसे मुलाक़ात कर लूँगा जो कभी मेरा पहला प्यार हुआ करती थी। इसी के साथ मैने निर्णय लिया कि कल प्रातः शुरू होने वाले इस सफर को आज रात ही किया जाए।
इस नेक ख्याल का दिमाग मे आना हुआ कि इक्कीसवीं शताब्दी के इंडिपेंडेंट लौंडे की तरह बैग उठाया और ला के अपनी तशरीफ़ रख दी उत्तर प्रदेश परिवहन की रोडवेज़ बस में।
इस नेक ख्याल का दिमाग मे आना हुआ कि इक्कीसवीं शताब्दी के इंडिपेंडेंट लौंडे की तरह बैग उठाया और ला के अपनी तशरीफ़ रख दी उत्तर प्रदेश परिवहन की रोडवेज़ बस में।
पंद्रह मिनट तक बस में मेरा बैग एक सच्चे साथी की तरह मेरा इंतज़ार कर रहा और मैं लक्ष्मणपुर (लखनऊ) की यादों में खोया वहाँ की पसंदीदा स्नैक्स को गोरखपुर के बसअड्डे पर ट्राय कर रहा था जो कि अजीब-सा ही मेलजोल है बन-मक्खन और चाय का। एक अरसे बाद उसे खा के ऐसा लगा मानो अश्वत्थामा को उसके शाप से मुक्ति मिल गयी हो।
ख़ैर, मेरी उम्मीदों पे खरा उतरकर मेरी बस 5 मिनट देर से चली और देखते ही देखते मानव इतिहास में सबसे उत्तम निर्माण पर यह आठ-पहिया बस दौड़ लगाने लगी।
ख़ैर, मेरी उम्मीदों पे खरा उतरकर मेरी बस 5 मिनट देर से चली और देखते ही देखते मानव इतिहास में सबसे उत्तम निर्माण पर यह आठ-पहिया बस दौड़ लगाने लगी।
शहर से बाहर निकल कर जैसे ही बस हाईवे पर चढ़ी, मेरे अंदर का कबीर थापर aka 'बनी' जाग उठा। दोनो कानों को कंटोप, जिसे हमारी पीढ़ी हैडफ़ोन बुलाती है, से ढक के उसमे Nucleya का संगीत लगा के नज़रें बाहर निकालीं तो पेड़ों को पीछे भागते हुए पाया; शायद मेरी तरह वो भी अपने अपने फोन का चार्जर किराए वाले कमरे में छोड़ आये होंगे, जिसे लेने जा रहे थे वो।
सर पर चाँद हमेशा की तरह मुझसे आगे आगे चल रहा है, ब्रेक लगने पर वो भी रुक जाया करता है, मानो मेरे साथ पकड़म-पकड़ाई खेल रहा हो।
कानो में 'इलाही . .' के बजते ही मेरा सर खिड़की की टेक लगा चुका है और मेरी आँखें भीष्म पितामह की तरह घरों को बिछड़ते और पिछड़ते हुए एकटक देख रही हैं. . . . . .
कानो में 'इलाही . .' के बजते ही मेरा सर खिड़की की टेक लगा चुका है और मेरी आँखें भीष्म पितामह की तरह घरों को बिछड़ते और पिछड़ते हुए एकटक देख रही हैं. . . . . .
relatable..😊
ReplyDeleteexpressed beautifully...
Thankyou.
DeleteWill be posting more relatable things soon
वाह लड़के !! इस लेख को पढ़ते वक़्त बस यही ख्याल आरहा था की मानो जैसे उस सफर में मैं कहीं दूर तुम्हारा हमसफर था।
ReplyDeleteधन्यवाद जीवेश जी।
Deleteआशा करता हूँ कि आगे भी ऐसी अद्भुत तारीफों के लायक काम करता रहूंगा 😀
Iska season 2 kb aa rha 😂😂😂
ReplyDeleteWaiting
bahut jald.
DeleteKripya aage bhi share kr de ☺️
ऐसा लगा मानो मैं ही सफर कर रही हूँ।
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है आपने।
धन्यवाद। ☺️
Deleteकृपया आगे भी शेयर कर दें।
Kaafi achaa hai.
ReplyDeleteThank-you Ms. Sengar. 😊
DeleteKindly share it with your traveler friends.
Jaise he padhna shuru kiya,shabdon ki bus aankhon ke samne chal padi.. awesome write up,keep it up..
ReplyDeleteThank-you
DeleteKindly share it with more people.
Wah nandan wah kya likha hai. Baithe baithe Safar ka pura Anand as gya.
ReplyDelete😄😄😄🤗
Deleteवाह❤️
ReplyDelete♥️
Deleteबहुत खूब....❤️
ReplyDelete♥️
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